Wednesday, September 15, 2010

gazazl -dushyant kumar

हो गई है     पीर पर्वत-सी     पिघलनी       चाहिए,
इस   हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज    यह दीवार,     परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,
हाथ     लहराते हुए     हर    लाश चलनी     चाहिए।
सिर्फ़ हंगामा    खड़ा      करना   मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि   ये      सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं          तो तेरे सीने            में सही,
हो कहीं भी आग,     लेकिन आग      जलनी चाहिए।

2 comments:

मनोज कुमार said...

ये मेरी प्रिय गज़ल है! काफ़ी प्रेरणा देती है। दुष्यंत जी को जितना पढो, उतनी बार नया लगता है।

dheeraj kumar said...

Manoj ji ye sachmuch kaaljayi gazal hai.