Wednesday, September 29, 2010

kavita

लगन के पाँव कभी थककर चूर होते नहीं 
द्वार उपलब्धियों के दूर होते नहीं |
अपने होंसलो का कद बड़ा लिया जिसने
उसके लिए खट्टे अंगूर होते नहीं ||

3 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
देसिल बयना-नदी में नदी एक सुरसरी और सब डबरे, करण समस्तीपुरी की लेखनी से, “मनोज” पर, पढिए!

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल, मनोज कुमार,द्वारा राजभाषा पर पधारें

bhupendra said...

Dheeraj ji namaskaar
aaise he hamen nayen vicharon se prerit karte rahen
Dhanywad
Bhupendra