Thursday, February 17, 2011

साहित्य


साहित्य
साहित्य समाज का दर्पण होता है ।
साहित्यसंगीतकला विहीन: साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ।
( साहित्य संगीत और कला से हीन पुरूष साक्षात् पशु ही है जिसके पूँछ और् सींग नहीं हैं । )
— भर्तृहरि
सच्चे साहित्य का निर्माण एकांत चिंतन और एकान्त साधना में होता है |
–अनंत गोपाल शेवड़े
साहित्य का कर्तव्य केवल ज्ञान देना नहीं है , परंतु एक नया वातावरण देना भी है ।
— डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन

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